क्या है धारा 35A और उसका इतिहास? क्यों छिड़ा है विवाद?

ये कानून उन्हीं लोगों को राज्य में ज़मीन खरीदने की इजाज़त देता है जो यहां के स्थाई नागरिक हैं

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सुप्रीम कोर्ट में धारा 35A की सुनवाई

धारा 35 A को लेकर जम्मू कश्मीर से लेकर दिल्ली तक माहौल काफी गर्म है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में इसको चुनौती दी गई है। और इस पर सुनवाई हो रही है।


क्या है धारा 35 A ?


ये कानून जम्मू-कश्मीर विधानसभा को ये अधिकार देता है कि वो राज्य में नागरिकता की परिभाषा तय कर सके। इस कानून के तहत केवल उन्ही लोगों को राज्य का नागरिक माना जाएगा जो 14 मई 1954 से पहले 10 साल तक राज्य में रहते आए हों। और उनकी कुछ संपत्ति भी राज्य में हो। ऐसे सभी नागरिकों को स्थाई नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया जाता है। स्थाई नागरिक ही राज्य में ज़मीन खरीदने के अधिकारी हैं। स्कॉलिरशिप और नौकरियों में भी स्थाई नागरिकों को सहूलियत देता है ये कानून। ये कानून जम्मू औऱ लद्दाख में भी लागू है।



महिलाओं के संबंध में प्रावधान   

कश्मीरी लड़कियों की शादी यदि गैर कश्मीरी पुरुष के साथ होती है तो वो स्थाई नागरिक का अधिकार खो देगी। हालांकि 2002 में जम्मू हाईकोर्ट का आदेश है कि लड़कियों का अधिकार जारी रहेगा लेकिन उनके बच्चों को ये अधिकार नहीं मिलेंगे।



धारा 35 A का इतिहास

जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ( फाइल)

महाराजा हरीसिंह ने 1927 में एक कानून लागू किया जिसके तहत राज्य के अधिकारों को परिभाषित किया गया। कानून के तहत राज्य में आने वाले बाहरी लोगों के लिए भी नियम बनाए गए। खासकर उत्तरी पंजाब के लोगों को आने से रोकने के लिए इसे बनाया गया था। क्योंकि उस समय पंजाब के काफी लोग राज्य में बड़े ओहदों और व्यवसाय में थे जिसे लेकर स्थानीय कश्मीरी नाराज़ थे।

जम्मू कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद शेख अबदुल्ला वहां के अंतरिम प्रधानमंत्री बने।

कश्मीर के भारत में विलय के समय हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के फ्रंट पेज की तस्वीर (Courtsy HT)

भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और शेख अबदुल्ला के बीच एक समझौता हुआ जिसे दिल्ली समझौता कहा जाता है।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ( फाइल)

इस समझौते के तहत 14 मई 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने एख आदेश के तहत धारा 35 को लागू किया। इसे धारा 370 का ही एक हिस्सा माना गया। धारा 370 कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज़ा देती है। इस समझौते के पीछ तर्क था कि बाहरी लोग कश्मीर में आकर वहां की विशिष्टता ना नष्ट कर पाएं। ये वही तर्क था जिस आधार पर महाराजा हरी सिंह ने 1927 में ऐसा ही कानून लागू किया था।


विवाद

बंटवारे के दौरान औऱ उसके बाद बहुत सारे लोग पाकिस्तान से भारत आए थे। जो लोग जम्मू कश्मीर पहुंचे उन्हे नागरिकता अभी तक नहीं मिल पाई क्योंकि वे धारा 35 के नियमों के अंतर्गत नहीं आते थे।

बंटवारे के दौरान बैलगाड़ी से पाकिस्तान से भारत आते हुए शरणार्थी ( फाइल)

 नियम को मुताबिक उन्हे स्थाई नागरिक बनने के लिए 1954 से पहले 10 साल तक राज्य का निवासी होना चाहिए।जबकि बाकि राज्यों में गए शरणार्थियों को सारे अधिकार मिल गए।जम्मू कश्मीर में ऐसे लोग ना तो सरकारी नौकरी हासिल कर सकते हैं,ना ही कोई ज़मीन वहां खरीद सकते हैं। और ना ही विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं,ना वोट डाल सकते हैं। दिलचस्प बात है कि ये भारत के नागरिक हैं औऱ इसके तहत इनके पास सारे नागरिक अधिकार हैं।

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